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पहर बीत गई रुठे हुय - Abhinav Ashesh

पहर बीत गई रुठे हुये,
पर ये उनको दिखायें कैसे
कश्मकश में बैठे हैं युं,
गुस्से में औनलाइन आयें कैसे
निगाहें तो युं भी ना मिलेंगी
मगर लास्ट सीन को उनकी नज़रों से छिपाएं कैसे
दबे से हैं जो लफ्ज होठों पे
उन्हें स्टेटस में सजायें कैसे
अभी तो रुठे हैं,
अभी औनलाइन आयें कैसे

उड़ना ज़रा सम्भल कर





परिन्दो ज़रा 'पर' बचा कर उड़ो

वक्त चुनाव का ही नहीं  

उड़नखटोलो का भी है

आस्मां पे हक सिर्फ़ तुम्हारा नही

इन नेताओ का भी है

तुम्हे तो पर बचपन मे आये होंगे

इनमें कुछ के आने अभी बाकी हैं

तु तो उड़ती फ़िरती है दाने के तलाश में

या चुनती तिनके आशियाने के आस में

इनके पास दोनों हैं, मगर,

और नोट बनाना अभी बाकि है

ज़रा सम्भल कर उड़ना परिन्दो

    और नेताओ का आना अभी बाकी है।     

डायरी - अभिनव अशेष



डायरी गुम हुई तो  क्या,
यादें अब भी बाकी है,
शब्द बिखर गये तो क्या,
भावनायें अब भी बाकी है,
जिन पन्नों पर संजोइ थी
दास्तां दिल की,
वो गुम हुई तो क्या,
जिस शिद्दत से लिखी थी सारी दास्तां,
वो दिल की स्याहि अब भी बाकी है,
डायरी गुम हुई तो क्या,
यादें अब भी बाकी है|
This piece of work came after being unsuccessful in my search for "meri pyari dyari" where I used to pen down my emotions in the form of articles, poems and short stories.

एक नया मकां - अभिनव अशेष


एक नये मकां की बुनियाद पड़ी है
घेरे जिसे,
गगन छूती ईमारतें खड़ी है |
कंक्रिट के शहर में इंट का पेड़ लगने को है,
ना देगा फल, ना छाया पथिक को,
छत इसके बस ठगने को है|
घास ढक गये हैं रेत की चादर से,
कट गये हैं पेड़ नीरादर से|
उस गौ को क्या पता था,
जो चली आई भुख मिटाने को|
जो आई तो मिला बस,
रेत ही रेत खाने को|
मोहल्ले के इकलौते मैदान से
हरियाली छिन गई,
फर्क क्या पड़ता हमें,
कौन सी ये बात नई|
जो खत्म हुए आशियाने परिन्दों के
तो क्या नया है,
न रहे घास - ना पेड़ तो क्या लुट गया है|
अब तो ये शहर ही कंक्रिट में ढलने लगा है,
ज़रा निकल देखो इस धूप में,
बिन पेड़ ये शरीर जलने लगा है|

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